जत्थेदार रछपाल सिंह जी की आत्मिक अरदास में सभी सिख जत्थेबंदी हुई शामिल: सिरसा


नई दिल्ली, गुरुद्वारा रकाबगंज साहिब में भाई लक्खीशाह वणजारा हाल में जत्थेदार रछपाल सिंह की आत्मिक शांति के लिए हुए समागम में परिवार एवं संगतों ने उनके बिछुड़ने वाली आत्मा को अकाल पुरख अपने चरणों में सदीवीं निवास बख्शने की अरदास की गई। इस अरदास समागम में देश के पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह एवं दिल्ली कमेटी के अध्यक्ष मनजीत सिंह जी.के. ने भी हाजरी भरी।


इस अवसर पर डा. त्रिलोचन सिंह पूर्व सांसद ने उनके जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मुझे भली प्रकार याद है कि जब पंजाबी राज्य की मांग के लिए आंदोलन चल रहा था तब जत्थेदार रछपाल सिंह ने 15 अगस्त 1965 को गुरुद्वारा शीशगंज साहिब से काले गुब्बारे छोड़े थे जो लाल किले पर जाकर छा गये थे। जिसका राजनीतिक अंतर्राष्ट्रीय मंच पर खासा जिक्र हुआ था। पंजाब एवं सिंध बैंक का नींव पत्थर भी आपने रखा था। आप मास्टर तारा सिंह जी का बहुत सम्मान करते थे और उनका जन्म दिन हमेशा हर वर्ष मनाते थे। आज उनके राजनीतिक कद का इस बात से पता चलता है कि जहां देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उनके अन्तिम अरदास में शामिल हुए वहीं अन्य पार्टीयों के प्रमुख भी आये।


इस अवसर पर डाक्टर जसपाल सिंह ने गुरबाणी की पंक्ति जे जाणा मर जाइीअै का जिक्र करते हुए कहा कि हमें गुरू के दिखलाये मार्ग पर चलना चाहिये। उन्होंने बताया कि जब मैं दिल्ली आकर अपना जीवन शुरू करने जा रहा था तब जम्मू के संत सिंह तेग ने जो कि अमर अबदुल्ला को राजनीतिक सलाह देते थे ने मुझे कहा कि सिख कौम का कोई मसला हो तो आप रछपाल सिंह जी को जरूर मिलें। 1947 के भारत-पाक बंटवारे के बारे में बताते हुए उन्होंने बताया कि यदि मास्टर तारा सिंह न होते तो आज आधा पंजाब एवं आधा बंगाल भी चला जाता और हिन्दुस्तान का अंतर्राष्ट्रीय सीमा कुछ और होती। 1969 में पंजाबी राज्य के आंदोलन में शीशगंज में लगभग 60 हजार सिख शामिल हुए थे। जिससे प्रभावित होकर मौजूदा सरकार ने उनपर 300 से भी अधिक झूठे केस डाल दिये थे। उस समय की फोटीग्राफी भी की गई थी। जो आज भी पंजाबी विश्वविद्यालय में मौजूद है। डा. जसपाल सिंह ने पगड़ी पर किये गये व्यंग पर कड़ा प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि 10 वर्ष प्रधानमंत्री रहने वाले मनमोहन सिंह पर बनी फिल्म को वाहियात बताते हुए सिखां को इस पर गुस्सा प्रकट करना चाहिये।


इस अवसर पर दिल्ली कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने भी जत्थेदार साहिब को श्रद्धाजंली भेंट की और कहा कि उनके दादा जी स. जसवंत सिंह (1925-90) के साथ बड़ी सांझ थी। उन्होने जत्थेदार साहिब के निधन को टकसाली युग का अंत से परिभाषित किया। इस अवसर पर दिल्ली कमेटी के महासचिव मनजिन्दर सिंह सिरसा ने जत्थेदार रछपाल सिंह को अपने श्रद्धासुमन भेंट करते हुए कहा कि मेरी जत्थेदार साहिब के साथ परिवारिक सांझ रही है। उनका गुरू घर के साथ अटूट संबंध था। उनके निधन से पंथ को ना पूरा होने वाला घाटा पड़ा है। आज नौजवानों के लिए वे प्रकाश पुंज थे। हमें उनके जीवन से मार्गदर्शन लेकर पंथ कौम के लिए अपना सब कुछ निछावर कर देना चाहिये। स. सिरसा ने डा. मनमोहन सिंह जी के बारे विचार प्रकट करते हुए कहा कि चाहे वे किसी भी राजनीतिक पार्टी से संबंध रखते हो पर वे सिखों में सम्मानित हस्ती है। उनकी शान एवं छवि को खराब करने वाली बनी मूवी एक्सीडैंटल प्राईमिन्सटर का हम विरोध करते हैं।


इस अवसर पर मास्टर तारा सिंह जी दोहतरी बीबी किरणजोत कौर ने संगतों को जत्थेदार रछपाल सिंह के बारे में बताया कि वे सच्चे अकाली थे। अकाली इतिहास कुर्बानियों का इतिहास है। जत्थेदार रछपाल सिंह आज तक मास्टर तारा सिंह का उतना ही सम्मान करते थे जितना उनके जीते जी करते थे। मुझे ऐसा लगता है कि आज मेरे परिवार का एक और सदस्य हमलोगों से बिछुड़ गया। इस अवसर पर स. त्रिलोचन सिंह, हरमीत सिंह कालका, एंव मनजिन्दर सिंह सिरसा ने सिख जत्थेबंदीयों की ओर से जत्थेदार रछपाल सिंह के सुपुत्र जसविन्दर सिंह हन्नी को पगड़ी भेंट की। इस अवसर पर दिल्ली कमेटी के संयुक्त सचिव अमरजीत सिंह फतेह नगर, सदस्य कुलवंत सिंह बाठ, हरिन्दर पाल सिंह, विक्रम सिंह रोहिणी, अमरजीत सिंह पिंकी, महिन्दर सिंह भूल्लर, ओंकार सिंह राजा, गुरमीत सिंह मीता, जतिन्दर सिंह साहनी, अकाली नेता कुलदीप सिंह भोगल, कुलमोहन सिंह, जसविन्दर सिंह जौली, एवं उनके परिवार के सदस्यों में अपार सिंह, कृतिका सिंह, हर्षदीप सिंह, चन्नवीर सिंह, मन्नत सिंह एवं अनेक गणमान्य लोग शामिल थे।